Poetry Hindi

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है

हर दाएं पृष्ठ के साथ है वाम पृष्ठ,

चाहा जिसे वह दूर बहुत, ये जहां क्यों आसपास है

एक पाँव उठ रहा विपक्ष में, दूसरा किसी के साथ साथ है।

यही है वो तानाबाना जो लाजवाब है,

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है।


प्रति क्षण विरोधाभासों से भरी,

प्रति क्षण कल्प विकल्प से सजी,,

प्रति क्षण बदलती रही यह अल्पना,

कर ना पाया कोई इसका हिसाब है,

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है।


यों तो तंग हैं लोग तुझसे,

किन्तु जीने की तमन्ना रख रहे,

जीते जी लगती है सारी दुनिया अपनी,

मौत में विलीन होने से सब डर रहे।

इस तरह तू ज़िन्दगी मौत का जवाब है,

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है।


जो ज़िन्दगी से हताश हैं, मौत से भयभीत क्यों,

जो मौत से भयभीत हैं, उनकी ज़िन्दगी पर जीत क्यों।

ज़िन्दगी का मौत से कोई मेल नहीं,

जो मौत से बेफिक्र हैं, उनका ही ज़िन्दगी का खेल सही।

ज़िंदादिली ही ज़िन्दगी का सबाब है,

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है।


मृत्यु स्वयं चलकर आती नहीं,

बुलाते हैं इसे हम अपनी भूलों से,

ज़िन्दगी बस वक़्त काटने का नाम नहीं,

तंदुरुस्ती भरी रहे सदा महकते फूलों से।

अतः मुझे ध्यान रहता है सदा,

मौत ज़िन्दगी को हराने को बेताब है,

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है।


ज़िन्दगी नाम है मृत्यु की पराजय का,

ज़िन्दगी काम है व्याधियों से टकराव का,,

व्याधियां हैं तो उपचार भी उपलब्ध हैं,

जरूरत है तो बस ज्ञान की, ज्ञानियों के सम्मान की,

नहीं तो यह ज़िन्दगी बस बोझ बेहिसाब है,

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है।


ज्ञानविहीन कर्म का महत्व नहीं,

ज्ञान ही कर्म का आधार है..

ज्ञान का उपयोग ना हो कर्म में

ज्ञान ऐसा रहता सदा निस्सार है..

कर्म जो उगे ज्ञान से, वही ज़िन्दगी का ख़िज़ाब है,

ज़िन्दगी,,तू एक खूबसूरत किताब है।

मुझे इश्क हुआ है तुमसे

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ,

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


जब से देखा है तुम्हें, छुआ है तुम्हारे शब्दों को,

टूट कर भी बिखरी नहीं, सलाम तुम्हारे जज्बों को।

लेखनी की सखी जो दवात तुम्हारे पास है,

खोजता हूँ वही दवात, जिसमें अपनी स्याही भरूँ

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।,


लगता है एक हो गए हैं मेरे पाँव दो,

आगे बढ़ने को एक और पाँव चाहिए,

विनय में जुड़ गए हैं मेरे हाथ दो,

लेखन को भी सहारा चाहिए।

अब जाऊं तो जाऊं कहाँ, किसी से क्यों विनती करूँ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


भिक्षा करना आता नहीं, दान मुझे भाता नहीं,

बिन मांगे मिलता नहीं, इस कारण कुछ पाता नहीं।

इश्क़ में लेना कुछ होता नहीं, बस होता है देना-देना,

बराबरी का रिश्ता होता, इससे आगे क्या और कहूँ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


मैं शांत था प्रशांत था, यह क्या किया है तुमने,

अब जी कहीं लगता नहीं, बस आस है -

हिलें पंखुड़ियां, स्वर उभरें बस मेरे लिए,

इसमें मेरा क्या कसूर है,

किये समर्पित तन मन बस तुम्हारे लिए।

मुझको तो कहना भी आता नहीं,

किन शब्दों से तुम्हारा सत्कार करूँ, ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


एक चाहत सोती सी अकुलाती है,

आँगन में हो पायल की रुनझुन,

मैं गीत लिखूं, तुम गाओ उनको,

ये विनती है मेरी, पगली सुन सके तो सुन।

मैं तुम्हारा भक्त बना,तुम्हें देवी मान प्रणाम करूँ ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


इंतज़ार में युग बीता किसी ने मुझे जाना ही नहीं,

ना पूछा मेरा हाल कभी, मुझको भी अपना होश नहीं।

तुमने रखा हाथ मेरे कंधे पर, जाने मेरे हालात सभी,

लगा मेरा भी कोई तो है, तुम्ही लगीं मुझे अपनी सी।

मैं तुमसे इश्क़ किये बिना, बोलो अब कैसे रहूँ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


तुमने जो मुझको दर्द दिया है, इसकी दवा कहाँ पाऊंगा,

तुमने बाँधा मुझको ऐसा छोड़ तुम्हें कहाँ जाऊंगा।

अब सब कुछ तुम पर छोड़ दिया, जीवन दो या मृत्यु,

मैं ऋणी रहूंगा सदा तुम्हारा,

तुमसे पाऊं जीवन या जीवन से मुक्ति।

दोनों और विजय मेरी है, अन्य कुछ मैं क्यों करूँ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


औरों की तरह तुमने भी यह मान लिया -

मेरी ज़िन्दगी एक हादसा है, हादसे से इश्क़ क्यों,

य तुम भी चल निकली मुझसे करवाकर प्रतीक्षा,

यूँ कटती रही है ज़िन्दगी, कभी प्रतीक्षा कभी परीक्षा।

अब ना होगी प्रतीक्षा नहीं झेलूँगा कोई परीक्षा,

अब पा लिया है सार मैंने, खुद को स्व से भरूँ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


यह कैसी है विडम्बना,

तुम्हें जब मानूँ बराबर की, तुम कहती मुझको बहुत बड़ा,

जब बड़े होने का अहसास करूँ,

अहसास कराती मुझको छोटा होने का,

मैं बड़ा रहा ना छोटा, तुम्हारी सुविधा का दास बना।

मेरा भी स्वाभिमान है, इसको तुमने जाना ही नहीं,

ज़िन्दगी सबकी अपनी है, अपनी है सबकी मजबूरी,

तुम नाप रही हो मुझको, जैसे कर रहा मैं मज़दूरी।

बस मैं ही जानता हूँ खुद को, तुमसे क्या उम्मीद करून,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


जीवन का यह भी सच है, मुझे विवश किया है आज़ादी ने,

तुम से जब इश्क़ बयान करूँ, अपनी आज़ादी खोता हूँ।

जब आज़ादी का वरण करूँ, सारी दुनिया खोता हूँ।

मेरे इश्क़ का यह युद्ध है मेरी प्यारी आज़ादी से,

इस द्वन्द का शिकार बना मैं हार गया बर्बादी से।

क्या तुम कुछ ऐसा कर सकती हो, मैं इश्क़ करूँ आज़ाद रहूँ।

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।


यह सब क्या है - असमंजस की एक कथा,

ज़िन्दगी से लगाव है, चाहे यह दे कितनी व्यथा।

जो भी कदम बढ़ता हूँ सुलझन का,

उलझन बढ़ती, जन्म होता नई उलझन का।

मेरे चारों और एक जाल बुना है -

उलझन सुलझन, सुलझन उलझन का।

जान लिया सच जीवन का, किसी से क्या उम्मीद करूँ,

मुझे इश्क़ हुआ है तुमसे, तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ।

मौत का वक़्त दूर बहुत है, फिर किसी से क्यों डरूं।

इबादत

स्वागत वसंत !

तुमने धरती में कितने रंग भरे,

हर रंग लगता अपना है,

हर रंग लगता सपना है।

किन्तु यह रंगत भी शरमा जाती है,

जब आये सामने -

सर से पाँव तक का बेमिसाल नज़राना,

जो धरती पर बस एक ही है।


गुलाब पंखुड़ी देखी हैं,

छुई भी हैं लालच में, नज़ाकत का एहसास करने,,

हो गया आशिक़ महकते चमन का,

एहसासों की इस बुलंदी पर

चाहा मर जाऊं उसी उपवन में।

तभी आयी सामने एक हसीना,

मुरझा गए गुलाबी एहसास सब,

नज़ाक़त की देवी, साक्षात मेरे सामने थी।


सरोवर में खिले कमल -

सफ़ेद, नील, लाल, पीत जैसे रंग लिए,

पत्तियों पर तैरती -

पानी की बूँदें दमक रहीं,

फूल खिला पानी से ऊपर उठकर,

नाज़ुक सलाख है फूल के रोशन को,

सब कुछ मन को ऐसे भाया,

अब शेष नहीं हैं ख़ुशियाँ जीवन जीने की।

तब पाया -

कुदरत ने यह सब पाया तुमसे है,

बनी हथेली पत्तियाँ, सलाख है गर्दन जैसी,

ऊपर एक फूल खिला है -

सुगंध प्रसारित करता, मधु जैसी मुस्कान लिए,

नयनों में काजल, कभी कोई नज़र ना लगे,

मंडराते बादल सी ज़ुल्फ़ लिए।


ज़िन्दगी की ख्वाहिश यों अधूरी रह जाती,

जो ना पाता तुमको सामने,

अपनी खुदी से मैं खुश हूँ लेकिन

जिसने तुमको जन्म दिया है -

उसी खुदा को मानने।

यों हुस्न की तारीफ़ करना मेरी आदत नहीं,

यह रचना एक इबादत है।

प्यार मेरा

आकाश भी लगता छोटा, कहां अपना प्यार धरूँ,

अब तुम्ही सम्भालो इसको, तुम्हें इतना प्यार करूँ।


ऐ मेरे नादान दिल, क्यों भटके अनजानी राहों में,

मिल गयी मंज़िल मुझे, गाता चल तू ख़्वाबों में /

खोजने पर पाया नहीं, बिन खोजे वो साथ में है,

सतत साधना की मंज़िल, हाथ जो मेरे हाथ में है।

चाहत ने पायी ताक़त, चाहे जितना प्यार करूँ,

आकाश भी लगता छोटा, कहां अपना प्यार धरूँ,

अब तुम्ही सम्भालो इसको, तुम्हें इतना प्यार करूँ।


प्यार की उम्र हज़ारों साल, क्यों हम इसको अल्प करें,

क्यों नापें उम्र अपनी-अपनी, जब प्यार का कल्प करें।

मैं भूलूँ अपना जीवन, अब तक कहीं भी भटका हूँ,

तुम्हें बस याद रहें इतना, मैं देख तुम्हें ही अटका हूँ।

बसने दो अपने ओठों पर, मैं तुम पर जो गीत रचूं,

आकाश भी लगता छोटा, कहां अपना प्यार धरूँ,

अब तुम्ही सम्भालो इसको, तुम्हें इतना प्यार करूँ।


बहुत दूर तुम रहती हो, फिर भी दिल में बसी रहो,

कहाँ बसोगी तुम प्रिये, मेरे साथ ही आकर तुम रहो।

सुबह सुबह जब सपने हों बसे तुम्हारी पलकों पर,

मैं कॉफ़ी तैयार करूँ एक बूँद लगाऊं ओठों पर।

उस पल की मुस्कान मधुर, प्रशंसा कैसे ना करूँ,

आकाश भी लगता छोटा, कहां अपना प्यार धरूँ,

अब तुम्ही सम्भालो इसको, तुम्हें इतना प्यार करूँ।,


वसंत का आगमन हुआ, प्यार की ऋतू जिसके पास है,

जितनी बहार है उपवन में, उतनी तन-मन में प्यास है।

रात्रि में बिस्तर की गर्माहट, दिन की वेला उपवन में,

प्रति पल मेरे पास रहो, ज्यों खुशबू बसती चन्दन में।

प्यार बिना कोई पल बीते ना, क्या-क्या उपाय करूँ,

आकाश भी लगता छोटा, कहां अपना प्यार धरूँ,

अब तुम्ही सम्भालो इसको, तुम्हें इतना प्यार करूँ।

आप मेरे मेहमान बने

फीकी-फीकी सी लगती थी मेरे घर की रंगत,

खुशामदीद, आप मेरे मेहमान बने।

अब सब ऐसे महका है, कस्तूरी बिखरी हो हिरणी की

उम्मीद नहीं थी मेरी नज़रें, इस कदर शैतान बने। ,

खुशामदीद, आप मेरे मेहमान बने।


ये तुम आईं या आया वसंत ?

डाली-डाली पर फूल खिले हैं उपवन में,

मैं समझ नहीं पाया तब तक

भटकी ना दृष्टि तुम्हारे यौवन में।

गुलाबी तन पर वस्त्र गुलाबी,

लैब लबालब, गुलाबी रंगत में साणे,

खुशामदीद, आप मेरे मेहमान बने।


जब भी मैं आँखें बंद करूँ,

सुर गूँज उठता है चुम्बन का,

मेरी नज़रों का दोष है यह,

या दोष तुम्हारे दर्शन का।

बस गयी हो नज़रों में ऐसे,

बंद पलकों से जो देख सकूं,

वही खुली पलकों के अरमान बने,

खुशामदीद, आप मेरे मेहमान बने।


बस नाम ही जानूँ, घर ना जानूँ,

यह कैसा पगला है इश्क़ मेरा।

क्या यह बस आकर्षण है ?

फिर भी नहीं इसमें दोष मेरा।

आकर्षण ही तो होता बीज प्रेम का,

आकर्षण ही रिश्तों का बीज बने,

खुशामदीद, आप मेरे मेहमान बने।


हफ्ता सा हो गया आँख मिचोली को

बोलो तुम भी, तुमको क्या एहसास हुआ ?

वन में हिरणी सी पागल मैं,

खोज रही हूँ कस्तूरी मृग को,

ऐसा कभी सोचा भी ना था,

फिर क्यों यह अनायास हुआ ?

प्रेमाग्नि धधक रही है,

दोनों ही इसके ग्रास बने,

खुशामदीद, आप मेरे मेहमान बने।


हफ्ता-हफ्ता बीत रहा है,

रफ्ता-रेड फटा हम डूब रहे।

मिट जाने दो इस हस्ती को,

जो जी रही थी अलग-थलग,

आगे देखा जाएगा, छाँव मिले या धूप रहे।

यही है नै ज़िन्दगी, फूल खिलें या चुभें काँटे,

दोनों ही डाली का अंग बने।

खुशामदीद, आप मेरे मेहमान बने।

चल रहा अकेले पाँव से

शायद थक गया हूँ,

शहर देखने आया हूँ गाँव से,

दूसरा पैर कभी पाया नहीं, चल रहा अकेले पाँव से.

तकलीफ तो है,

मुस्करा रहा हूँ कराह कुछ दबी रहे .

पैर में काँटे चुभते रहे हैं,

बैठ जाता हूँ, ज़िन्दगी कुछ सधी रहे.

ये काँटे ही तो मेरे अपने हैं,

साथ-साथ चलते हैं चलती-फिरती छाँव से.

दूसरा पैर कभी पाया नहीं, चल रहा अकेले पाँव से.

लोग देखकर निकल जाते हैं -

तन्दुरुस्त हट्टा-कट्टा है, इसे कोई तकलीफ नहीं .

कोई पास बैठे, छुए मुझे तो जाने –

मुस्कराना मेरी तजवीज़ है, तकदीर नहीं.

भीड़ से दूर होकर चल रहा हूँ,

इस तरह से बच रहा हूँ लोगों की कांव-कांव से,

दूसरा पैर कभी पाया नहीं, चल रहा अकेले पाँव से.

बेशक तन्दुरुस्ती एक सकून है,

किन्तु कोई एहसास नहीं करता इसे भी दूसरे पाँव की दरकार है.

ज़िन्दगी भर चलते रहना होगा,

मुझे ही क्यों अनदेखा करती जाती जो कुदरत की सरकार है.

क्या ही अच्छा होता धरती बस समुद्र होती, सफ़र करता नाव से,

दूसरा पैर कभी पाया नहीं, चल रहा अकेले पाँव से.

दान दक्षिणा भिक्षा, स्वाभिमान के विरुद्ध हैं,

माँगू किसी से पाँव दूसरा, आचरण भी अशुद्ध है.

ज़िन्दगी मेरी अपनी है,

जीना है इसे, बचते हुए दुनियावी दांव से,

दूसरा पैर कभी पाया नहीं, चलता रहा अकेले पाँव से.

तनहा तनहा मेरा दिल

सूना सूना मेरा दिल,

तन्हा तन्हा मेरा दिल

सर्द रातों में अकेला चलता,

जो रोता रोता रिसता है,

लोग उसे कह चाँदनी, होते आनन्दित

उस चन्दा जैसा -

जीवन ढोता मेरा दिल,

सूना-सूना मेरा दिल,

तन्हा-तन्हा मेरा दिल।


रातों में नींद नहीं आती,

सपना भी देखूं कैसे?

दिवा-स्वप्न जलाते मन --

सीने पर होता सिर का एहसास,

केश तितर-बितर हो चुके होते,

आँखें मन्द-मन्द मुस्काती हैं

चेतन मन रोता आंसू पीकर,

कोई तो है जो साथ निभाता है -

सूना-सूना मेरा दिल,

तन्हा-तन्हा मेरा दिल।


मैं भी चाहूं एक संगिनी,

काली हो या गोरी हो,

किन्तु अनुशासन से सीमित हो,

केश पके हों मेरे जैसे,

मन में उमंग जीवित हो,

चलते-चलते थकने लगा हूँ,

कब तक उसका इंतज़ार करूँ,

जो राही हो सूने पथ की

क्या यूँ ही मिल जाएगी,

जो अब तक नहीं हुआ,

कैसे उसकी उम्मीद करूँ,

या फिर बस स्वीकार करूँ ,

सूना-सूना मेरा दिल,

तन्हा-तन्हा मेरा दिल।


जैसे मैं खोज रहा हूँ उस को,

क्या वो भी मुझे खोजती होगी।

जिस तरह से मैं सोच रहा हूँ,,

क्या वो भी ऐसा सोचती होगी।

काश कि ऐसा होता हो,

तन्हाईयाँ मिट जाएंगी सबकी,

बस अपनी राह पर चलना होगा,

हमराही मिल जायेगी सबकी।

यह भी एक दिवा-स्वप्न है,

किन्तु यथार्थ की मज़बूरी है,

सूना-सूना मेरा दिल,

तन्हा-तन्हा मेरा दिल।

तुम आ जाओ बस एक बार

एक दिन तुमने मेरा दर्द जिया था,

मेरी आँख का अश्क पिया था,

पूछा था मुझसे हाल मेरा,

जो एहसास हुआ मुझको पहली बार

तुम आ जाओ बस एक बार।


सच कहता हूँ,

मुझको तुमसे प्यार हुआ है,

चाहूँ तुमसे बस इतना -

पूछो तुम मुझसे हाल मेरा

नहीं रहे बीच में कोई पर्दा,

मैंने अपना जो हाल कहा था,

सब सच था, तुम पर विश्वास अटल था,

फिर से मुझको एहसास कराओ,

जैसा किया था उस बार,

तुम आ जाओ बस एक बार।


मैं तुमको अब तक नहीं जानता,

मैं भी तुमसे कुछ पूछूं,

इसका हक भी नहीं माँगता.

तुमसे मुझको लगता है,

दुनिया में अब भी है कोई

जो दर्द मेरा जानता है .

चाहूं तुमसे बस इतना,

पूछती रहो हाल मेरे बार-बार,

तुम आ जाओ बस एक बार।


तुम आ जाओ,

मैं सजदा करूँ तुम्हारा

मैं छू ना पाऊँ तुमको,

लब भी मिलने से दूर रहें,

जुल्फें ना बिखरें मेरे सीने पर,

जाँघों में ना हलचल हो,

बस चाहत है देखूं तुमको बार-बार,

तुम आ जाओ बस एक बार।


अब जब भी तुम आओगी,

पाओगी मुझको वहीं खड़ा,

छोड़ा था तुमने पिछली बार,

तुम जो भी मुझसे चाहोगी,

मैं वही करूंगा, वही कहूँगा,

न पूछूँगा तुमसे प्रश्न कोई,

दे दूंगा तुमको सब अधिकार,

तुम आ जाओ बस एक बार।

निःशब्द

दोहरा जीवन जी रहा हूँ, सज़ा यह कैसी भोग रहा,

हाथ में कलम थामे हूँ, कागज़ रंगने से रोक रहा .

एक कथा मुस्कान भरी, जो बाहर से दिखती है,

एक व्यथा आंसू छल-छल, अंतर्मन में रिसती है


रात अभी आधी बाकी है,

गहन निद्रा में वही सपना देखा,

सपने में तुम सिसक रही हो,

अश्रुधारा संग मैं खींच रहा शपथ रेखा

जिसमें हों हम उपस्थित दोनों,

है जीवन का अंतिम अवसर

यों बाह्य कथा छद्म है सारी,

अंतर्व्यथा बहती सरसर


बालकपन के दिन थे, जब से परिचित हम दोनों,

परिपक्व हुआ अंतर्मन बन्धन, मूक हुए हम दोनों.

यह सामाजिक अनुशासन, ऐसे थे संस्कार अपने,

प्रेम किया, कर्मों पर त्यागे नहीं अधिकार हमने . .

चार नयन व्याकुल रहते, जब तक करते ना संसर्ग वे,

आई तरुणाई, निःशब्द रहे, कैसे करते स्पर्श वे .

घमासान तूफ़ान उठा नभ में, धरा विकंपित होने लगी,

अचानक ज्ञात हुआ मुझको, वह मित्र की दुल्हन बनी

वह मित्र की बनी संगिनी, मैं खडा-खडा निष्प्राण हुआ,

फिर भी दोनों निःशब्द रहे, गहन वेदना आघात हुआ..

यदा-कडा मित्रवत मिलते थे, इतिहास में प्रेम दमन किया,

एक बार उसको अपना माना, कुछ शब्दों का प्रचालन किया

आँचल में छिपा चाँद, फफक फफक कर रो उठा,

मेरे अश्क भी बह निकले, इतिहास हमारा दहक उठा

तभी शपथ ली थी मैंने, ऐसा अवसर ना आने दूंगा,

जहां तुम होगी, मैं वहां नहीं उपस्थित हूँगा

तबसे मैं भोग रहा हूँ दोहरे जीवन की सज़ा,

मुस्कान कथा में छिपी रहती है, अंतर्मन की व्यथा


क्यों मूक रहा मैं, बालकपन से तरुणाई तक,

क्यों प्रेमालाप नहीं किया, थामा नहीं उसका हाथ शहनाई तक

ना जाने क्यों वह सपना मेरा जाग उठा सपने में,

शायद उसने भी सपना देखा सिसकी होगी सपने में


दोहरा जीवन जी रहा हूँ, सज़ा यह कैसी भोग रहा,

हाथ में कलम थामे हूँ, कागज़ रंगने से रोक रहा .

एक कथा मुस्कान भरी, जो बाहर से दिखती है,

एक व्यथा आंसू छल-छल, अंतर्मन में रिसती है

प्रणय

तुम्हारा एक शब्द प्रिये,

जिसने मुझको जगा दिया है।

मैं परिपक़्व बीज सुषुप्त,

तुमने मुझको उगा दिया है।


लगता है तुम भयभीत हो -

वय का जो प्रपंच हम दोनों के मध्य है।

भूली हो तुम -

तुम्हारे पास नवयौवन की ऊर्जा,

मेरा अनुभव भव्य है।


मैं प्रणय का प्यासा,

तुम प्रणय का प्रतिरूप हो .

शीत रातों का मैं प्रहरी,

तुम शीत सुबह की धुप हो .


आओ, हम एक गीत रचें प्रणय पर,

जीवन को एक नया अर्थ दें

संगीत मधुमय कामना हों।

कल न जाने हम बिखर जाएंगे,

भोग लें आनंद आज -

जब भी हमारा सामना हो।


कुछ कदम तुम चलो

कुछ कदम मैं आगे बढ़ूँ।

तुम रचती रहो प्रणय लीला

मैं तुमको बारम्बार पढूं।


काम रथ के दो चक्र हैं हम

साथ साथ हमें चाहिए चलना।

जब तक हम दोनों का संग बना है

तब तक आनंद भोग चाहिए करना।


अब भी तुम स्वतंत्र हो -

बरसाओ रस या कर दो पतझड़।

होगा मुझपर एहसान तुम्हारा

काम कला की होने दो हलचल।


प्रेम के इस बंधन में,

मुझको अधरों का रस पीने दो।

मैं करूँ तृप्त तुमको

तुम मुझे नए रूप में जीने दो।

एक ख्वाब

कुछ छंद तराशे हैं मैंने,

जिनके शब्द देख तुम्हें इतराते हैं,

सोने जैसे दिन हैं इनके चांदी जैसी रातें हैं..


मेरा एक खूबसूरत ख़याल हो तुम,

जैसे दूर आसमां में बसा है चाँद,

वैसे ही मेरी ज़िन्दगी का ख्वाब हो तुम.


देखो, मेरे पास कभी ना आना,

इस खूबसूरत ख्वाब को रहने देना बस ऐसे ही,

ख्वाब में ही हम तुम मिलेंगे -

इस खूबसूरत ख़याल को संभाले रखना बस ऐसे ही.

धरती पर हमें कुछ दिन और बिताने हैं,

अपने ख्वाब को छूकर यहाँ खराब ना करना,

जब उठ जायेंगे यहाँ से हम और तुम,

होगी मुलाक़ात आसमान में -

अपना यह प्यारा ख्वाब बनाए रखना,

अभी कुछ ना कहेंगे हम एक दूजे से,

बातों को यूं ही बाकी बनाए रखना,

अब यही अपना पगला बालक है -

इसको यूं ही पाले रखना।


ये शब्द वहां से आये हैं,

हम जिस जहां के प्राणी हैं,

धरा के लोग नहीं जानते,

हम सिर्फ हवा हैं, ना मिट्टी ना पानी हैं.

मार्च २०,२०२०

मधुरा

मधुरा नहीं, मधुर मधुर मदिरा हो तुम,

जीवन भर जिसका नशा रहे,

तुम ऐसी मधुरा हो.


तुम जो आसन पर लेटी हो,

यह आलस नहीं, विलासी मद है तुम पर,

पलकें भी झुकी झुकी सी हैं,

चाहत भी ठहरी है तुम पर।

तुम प्रसाद हो कुदरत का धरती को,

इस मद में डूबा लो मुझको,

मैं मैं ना रहूँ सुन स्वर तुम्हारा,

तुम मेरी हस्ती की हरिता हो।

मधुरा नहीं तुम मधुर-मधुर मदिरा हो।


तुम जाओ कहीं भी, मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँ,

तुम देखो ना देखो मुझको,

मैं पल-पल तुम्हें निहार रहूँ..

मुस्करा दो तुम बस एक बार,

मेरा भी जीवन संवारो तुम,

प्यास बुझेगी जीवन भर की,

आओगी बता दो तुम.

अधूरा हूँ मैं तुम्हारे बिन

मैं रेत रेगिस्तान का,

तुम कल-कल बहती सरिता हो,

मधुरा नहीं तुम मधुर-मधुर मदिरा हो।

एक बूँद हूँ पानी की

आकाश में जन्मा हूँ, एक बूँद हूँ मैं पानी की

पास तुम्हारे आया हूँ, तुम लगतीं पहचानी सी.


मेरा कुछ क्षण का अस्तित्व, तुम्हारी प्यास बुझाने को,

तुम्हारे अधरों की सुर्खी, काफी है मुझे बहलाने को.

मेरे जीवन का मकसद है - सजावट अपनी रानी की,

आकाश में जन्मा हूँ, एक बूँद हूँ मैं पानी की.


कण-कण भावों का संगृह, मैं बूँद बनकर जिया हूँ,

क्षण-क्षण प्यार भरा है, तुम पर निसार किया है.

यूं मिटना बेकार नहीं, सुखद वेला प्रेम कहानी की.

आकाश में जन्मा हूँ, एक बूँद हूँ मैं पानी की.


मेरे दीर्घ सफ़र में कोई ठहराव नहीं था,

अंततः पास तुम्हारे आया, मेरा टकराव यहीं था.

विच्छिन्न हुआ अब ऐसे - धरा सिक्त कर जानी की,

आकाश में जन्मा हूँ, एक बूँद हूँ मैं पानी की.


रास्ते में शीत मिला तो मैं ओला बन जाता हूँ,

गर्मी के मौसम में, मैं जग को भूल जाता हूँ.

आँचल फहराकर देखना कथा मेरी कुर्बानी की,

आकाश में जन्मा हूँ, एक बूँद हूँ मैं पानी की.

पास तुम्हारे आया हूँ, तुम लगतीं पहचानी सी.

चूमने दो चाँद को

रात रात बीत गयी

सुबह सुबह की बात है

चूमने दो चाँद को

रात की सौगात है .


पलकें झुकी-झुकी सी हैं

अधरों पर अरुणा छाई है

यह क्या ! चंदा में छुपा हुआ सूरज

क्या इसकी शामत आयी है

पलकें बंद कर के देखो

अभी तो बाकी रात है

चूमने दो चाँद को

रात की सौगात है


आज सुबह तभी होगी

जब तपस तृप्त हो जायेगी

ठहर जाएगा काल भी

धरा धरी रह जायेगी

शांत प्रशांत आकाश है

ना क्षितिज पर उत्पात है

चूमने दो चाँद को

रात की सौगात है


हलचल में जो व्याकुलता थी

शांत हुई आनंद बनी

समा गयी धरती नभ में

प्रियतम रूप में सनी

हो गए क्षितिज स्वरुप हम

मिलन की बारात है

चूमने दो चाँद को

रात की सौगात है

रात रात बीत गयी

सुबह सुबह की बात है

मेरा इंतज़ार करना

यूं तो वायदा नहीं था कोई ज़िन्दगी से,

तेरा साथ तो मैं मानकर चला था .

डोर अभी टूटी नहीं है मेरे ख्वाब की -

मैं आ रहा हूँ पास तेरे, मेरा इंतज़ार करना

शाम तक पहुंचूंगा, सुबह ही चला था .

यूं तो वायदा नहीं था कोई ज़िन्दगी से,

तेरा साथ तो मैं मानकर चला था .


जवानी बीत गयी यूं सफ़र में -

रोज़गार, मुसीबतें और ख्वाहिशें

फिर भी हाथ खाली रह गए,

शाम को फिर शुरू करेंगे ज़िन्दगी

मुलाक़ात के लिए लम्बी रात होगी

सुबह हो ना हो कोई गम नहीं,

रात ही में अरमां पूरे होंगे.

एक तुम थीं, एक मैं था, मध्य में एक डोर थी,

डोर के सहारे हमारा सपना पला था,

यूं तो वायदा नहीं था कोई ज़िन्दगी से,

तेरा साथ तो मैं मानकर चला था .


दो कदम ही चले थे रास्ते पर

जुदा पगडंडियों पर चल दिए,

बीच की डोर भी कहीं खो गयी

दिन भर की धूप में चलते-चलते

थक हार कर ख्वाहिशें सब सो गयीं.

शाम होगी, आराम होगा, थोडा पछतावा भी होगा

बेकार थी यह ज़िन्दगी बिन तुम्हारे

इसकी धूप में मैं क्यों जला था

यूं तो वायदा नहीं था कोई ज़िन्दगी से,

तेरा साथ तो मैं मानकर चला था .

सफ़र

रास्ता सुनसान है, अँधेरा छा रहा है,

दू....र बहुत जाना है, बस चलते जाना है,

शायद कहीं मिले, कभी मिले,

जिसे मुझे पाना है.

    • * *

बहुत देर हो गयी चलते-चलते ,

रात अंधियारी हो चली है,

थकान तो नहीं है, प्यास उभर रही है,

आस उघड रही है.

  • * *

निशीथ काल आ गया है, घनघोर अँधेरा छा गया है,

रास्ता भी दिखाई देता नहीं.

सुबह का क्यों इंतज़ार करूँ, आ जायेगी चाहेगी जब,

परीक्षा काल आ गया है.

  • * *

रास्ते के किनारे पड़ी शिला पर

कब कैसे पहुंचा, कुछ याद नहीं,

शायद, आँख लग गयी थी,

ऊंचे अम्बर के नीचे आराम बहुत था,

कुछ भी तो फ़रियाद नहीं.

  • * *

एक स्पर्श सा महसूस किया,

सुबह हो गयी है, किसान खेतों को आने लगे हैं,

लगता है छूने से पहले जान्छ बहुत था.

पानी भरा करुआ मेरी और बढ़ा है,

कलाइयां सूनी हैं, घूंघट आधा चढ़ा है,

पी गया हूँ सारा पानी, पता चला प्यासा बहुत था.

जब चली गयी वह दूर बहुत,

ध्यान आया - आँखों में कुहासा बहुत था.

  • * *

फिर उठकर चल दिया हूँ,

रोशन है रास्ता, ताप भी स्वीकार किया,

ठोकर लगी गिर गया,

किसी ने मुझे देखा नहीं, उठा और फिर चल दिया.

रोशन ज़माने से तो बेहतर था अँधियारा रात का,

राहत बहुत थी - कोई ठोकर नहीं थी.

अप्रैल २३, २०२०

कविता

ज्वार प्रसार काल आने पर, सागर पसरा धरती पर.

अपना फ़र्ज़ किया निर्वाह, दिए मोती प्रेयसी को.

मानव मन का पटल विस्तार, जब भावों से भर जाता,

उपहार दे जाता सृष्टि का, आलिंगन में प्रेयसी को.

मानव मन जहाँ आता-जाता, कविता सृष्ट करता जाता,

अपने मौन में करता तलाश, पुकारता प्रेयसी को.


मेरी प्रेयसी एक अल्पना, आधार उसका यह धरा,

मैं सागर उसके आँचल में, करता मुदित प्रेयसी को.

भाव विभोर होकर मैं, उसके आँचल में सो जाता,

उसके ओठ कम्पित होते, झंकृत करते प्रेयसी को.

यों कविता ही मेरी प्रेयसी, प्रेयसी है मेरी कविता, .

मेरा सर्वस्व समर्पित है, अस्तित्त्वहीन प्रेयसी को


कविता है मन का विस्तार, महक जैसे फूलों की,

भावों से महकती कविता, करती मुदित प्रेयसी को.

हर कविता एक ज्वार होती, शब्दों के मोती लिए,

भावावेश शमन होता जब, कर संपन्न प्रेयसी को,

धन्य सागर हो शांत प्रशांत, तरंग भी सो सी जातीं,

दे जाता सुगंध अपनी अधरा धरा सी प्रेयसी को..


दुनिया बन गयी बाज़ार कब, मुझको पता नहीं लगा,

खोया था अपने भावों में, रहा खोजता प्रेयसी को,

मेरे भाव घाव जैसे हैं, छूने से पीड़ा होती,

पलकों से पलकों में जाते, ये उपहार प्रेयसी को,

मुझको पहचानोगे कैसे, रहते हो बस देहों में,

मैं भावों का एक पुंज हूँ, करता रोशन प्रेयसी को,

घर जाते बन्धु

सुबह बेबस है, बेबस है शाम,

घर जाते बन्धु तुमको प्रणाम .. तुमको प्रणाम..


तुम्हारा पसीना चलाता मशीनें, बनाता मकान

धनवान पाते सुख के सामान,

ये सामान तुम्हारे सपनों के धाम

पसीना तुम्हारा रहा बेनाम,

सुबह बेबस है, बेबस है शाम,

घर जाते बन्धु तुमको प्रणाम .. तुमको प्रणाम..


घर से दूर, दूर अपनों से

चले आते हो मजबूर सपनों से,

जिनके लिए ना किया आराम,

वो भी तुम्हारे ना आये काम,

सुबह बेबस है, बेबस है शाम,

घर जाते बन्धु तुमको प्रणाम .. तुमको प्रणाम..


तुम्हारे लिए यहाँ कोई सुख नहीं है,

अपनों के बीच कोई दुःख नहीं है,

सड़क पर ला छोड़ा तुम्हें करके बेकाम,

सरकार पराई जनता गुलाम,'

सुबह बेबस है, बेबस है शाम,

घर जाते बन्धु तुमको प्रणाम .. तुमको प्रणाम..


तुम्हारी तरह ही सब नफ़रत के शिकार,

कभी तुम मुस्लिम, कभी दलित, कभी बीमार,

तुम्हारे दुःख में सभी दुखी हैं,

यहाँ केवल धनवान सुखी हैं,

जिन्हें चाहिए सब एश-ओ-आराम

शासन-प्रशासन सब उनके गुलाम,

सुबह बेबस है, बेबस है शाम,

घर जाते बन्धु तुमको प्रणाम .. तुमको प्रणाम..


यहाँ तुम्हारा कोई नहीं है,

कल-कारखाने भी तुम्हारे नहीं हैं,

अब लौट कर ना बनना इनके हाथ

रूखी-सूखी खाना अपनों के साथ,

करना वहीँ पर कोई भी काम

सुबह बेबस है, बेबस है शाम,

घर जाते बन्धु तुमको प्रणाम .. तुमको प्रणाम..

मई 6, २०२०

आज दर्द बोल रहा है

आज दर्द बोल रहा है, मन मेरा डोल रहा है.

मुझे जरुरत है किसी की, मेरी किसी को जरुरत नहीं है.

आईने से पूछा मैंने - मेरे जैसी कोई सूरत नहीं है.

फिर भी लगता है मुझको, कोई मुझे टटोल रहा है,

आज दर्द बोल रहा है, मन मेरा डोल रहा है.


मेरे आसमान में अँधेरा खड़ा है,

कैसे खोलूँ आँखे, अँधेरा रौशनी से बहुत बड़ा है.

तुम्हारे सिवाय कोई और नहीं है -

जो आहिस्ता-आहिस्ता खिड़की खोल रहा है,

आज दर्द बोल रहा है, मन मेरा डोल रहा है.


जानता हूँ तुम मेरी नहीं हो,

मेरी तरह राख की ढेरी नहीं हो.

अन्दर-अन्दर कोई गीत गम का गा रहा है,

आज दर्द बोल रहा है, मन मेरा डोल रहा है.


आ जाओ, पास बैठो ज़रा,

नब्ज़ चल रही है अभी, बेशक लगता मरा.

छिपालो मुझको आँचल में, कोई मुझको डरा रहा है,

आज दर्द बोल रहा है, मन मेरा डोल रहा है.

मई 7, २०२०

मोदी शासन में मजदूर

भूखे प्यासे बे घरबार भारत के मजदूर हुए,

मोदी तेरे शासन में मरने को मजबूर हुए.


ये ही चलाते कारखाने आलिशान भवन बनाते,

धनवानों की सुख-सुविधा के साजो-सामान बनाते.

मई २४ सं 20 को मोदी ने तानाशाही हुक्म दिया,

कल-कारखाने ठप किये, आना-जाना बंद किया,

जो रोज़ कमाकर खाते थे उनपर विचार नहीं हुए,

भूखे प्यासे बे घरबार भारत के मजदूर हुए,

मोदी तेरे शासन में मरने को मजबूर हुए.


चालीस करोड़ भूखे सड़कों पर सबके हुए पराये,

दूर बहुत अपने घर से, ना ठहर सके ना जा पाये.

आँखों में आंसू छलके अपनों को याद बहुत किये,

सैकड़ों मील की दूरी, बेबस पैदल ही चल दिए.

सिर पर रख सामान अपना चलने को मजबूर हुए,

भूखे प्यासे बे घरबार भारत के मजदूर हुए,

मोदी तेरे शासन में मरने को मजबूर हुए.


भूखे पेट थके देह, पुलिस के डर से ना सोये,

जो देखा छीना-झपटा, ज़हरीले पानी से धोये,

कैसे-कैसे दुःख झेले, मौत मिल रही सस्ते में,

भूखे-प्यासे कितनों ने, ली सांस आख़िरी रस्ते में

शासन ने शत्रु माना, इनके जीने-मरने से दूर हुए,

भूखे प्यासे बे घरबार भारत के मजदूर हुए,

मोदी तेरे शासन में मरने को मजबूर हुए.


डर पुलिस का भारी, रेल पटरी पर रात गयी,

पटरी पर थक कर सोये, रेल आकर काट गयी.

कौन है अपराधी मौत के बेदर्द कहर का,

नशा है जिनको निर्धन से नफ़रत के ज़हर का.

श्रम का शोषण किया, आयी मुसीबत दूर हुए,

भूखे प्यासे बे घरबार भारत के मजदूर हुए,

मोदी तेरे शासन में मरने को मजबूर हुए.

मई ९, २०२०