Revolutionary Politics

क्रान्तिमय राजनीति (Revolutionary Politics)

शासन व्यवस्था में जनता की आवाज़

- ईमानदारी सर्वदा सर्वथा -

2014 से भारत की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को नष्ट-भृष्ट किया जा रहा है जिसमें सर्वाधिक विनाशकारी भूमिका मुख्या चुनाव आयुक्त सुनील अरोरा की रही है जिसने वोटिंग मशीनों की खरीद से लेकर वोटों की गिनती तक के सभी चरणों में निंदनीय कार्य किये. इससे जनता के वोट का महत्व समाप्त हुआ और लोकतंत्र तानाशाही बन गया .

२०१९ चुनावों के परिणामों की संपूर्ण सूचनाओं सहित घोषणा किये बिना ही मोदी सरकार-2 को स्थापित कर दिया गया जो तकनीकी स्तर पर अवैध है .इसी अवैधता के कारण सरकार ने तानाशाही रूप ले लिया . वाणी की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाकर विरोधियों को कारागारों में डाला गया, पूरे कश्मीर को एक विशाल क़ैद बनाकर वहां के समर्थ पुरुषों को सुदूर जेलों में डाल दिया गया और शेष निस्सहाय जनसख्या को सेना के हवाले कर दिया गया. यही स्थिति 6 महीने से अधिक बीतने पर आज भी बनी हुई है.

सत्ताधारियों ने आर्थिक अनियमितताओं द्वारा बैंकों का धन अपने मित्रों द्वारा विदेशों को भेज दिया गया . शासन तंत्र के विज्ञापनों पर अनाप-शनाप खर्च किया गया, खरीदारियों में भ्रिश्ताछार का सहारा लिया गया, जिनके कारण देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी, यहाँ तक कि रिज़र्व बैंक जैसी स्वायत्त संस्थानों के आकस्मिक कोष भी रिक्त कर दिए गए . अनेक सार्वजनिक उद्यमों में सत्ताधारियों ने अपने लोगों की नियुक्ति करके उनके समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न कर दिए गए . शासकों ने कुछ उद्यमों को अपने मित्रों को कौड़ी के भाव हस्तांतरित कर दिया .

हिन्दू और मुसलामानों के मध्य घृणा के बीज बोये गए, आर एस एस की सहयोगी हिन्दू महासभा, बजरंग दल, आदि निजी सेनाओं द्वारा केंद्रीय सरकार के अधीन दिल्ली पुलिस के सहयोग से मुस्लिम बहुल क्षेत्र उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसक दंगे कराये गए, अनेक लोगों के घर एवं दूकाने जला दी गयीं, मस्जिडॉन को आग लगा दी गयी. इस सब के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा पीड़ित मुस्लिमों को ही दोषी के रूप में दण्डित किया गया.

मोदी सरकार द्वारा सरासर लापरवाही करते हुए विदेशों से 15 लाख भारतीयों को विशेष विमानों द्वारा भारत लाया गया एवं पूरे भारत में कोरोना के जीवाणु प्रसारित करने हेतु मुक्त कर दिया गया जिससे यह विश्वव्यापी संकट भारत की जनसँख्या को ग्रास बनाने लगा . आर्थिक संकट से जूझते भारत के पास लोगों के रक्षक चिकित्साकर्मियों की सुरक्षा के भी साधन नहीं थे, इसे एक स्वर्णिम अवसर मानते हुए शासकों ने विश्व बैंक से 1 अरब डॉलर का क़र्ज़ लिया है जिसका अब दुरूपयोग किया जा रहा है.

देश की ४० करोड़ निर्धन आबादी आज विनाश के कगार पर है - भूख और कोरोना विषाणु के कारण., उनके लिए ना कोई रोज़गार है और ना ही कोई आर्थिक सहायता एवं ना ही कोई चिकित्सा सुविधा . सत्ताधारी लोग जनता के इस दुःख में भी मोदी-केअर जैसी निज्जे चतुराइयों के माध्यम से धन अर्जित करने में व्यस्त हैं.

अप्रैल १०, २०२०

Revolutionary Politics

People's voice in Governance

- Honesty, All Ways, Always -

क्रान्तिमय राजनीति

शासन व्यवस्था में जनता की आवाज़

- ईमानदारी सर्वदा सर्वथा -


मानव अधिकार आयोग , नयी दिल्ली

केंद्रीय पब्लिक ग्रिएवांस रेड्रेस्सल फोरम

पंजाब नेशनल बैंक

बैंकों के माध्यम से निर्धनों की गुजर-बसर में रोड़ा

महोदय ,

मानवीय जीवन संकट के वर्तमान समय में बैंक सेवाओं की स्थिति नोट बंदी काल से भी बहुत अधिक बुरी कर दी गयी है . मोदी सरकार ने कोरोना संकट के कारण किये गए लॉक-डाउन को जन साधारण के जीवन-यापन में रोड़ा अटकाने के लिए बैंकों को माध्यम बनाया है . जिन लोगों के पास बैंक खतों में गुजर-बसर हेतु रकम जमा है बैंक उनको उनकी रकम निकालने में बाधा खडी कर रहे हैं . बैंकिंग सेवा अवधि केवल एक घंटे कर दी गयी है जिस काल में केवल 10 -15 ग्राहक ही अपनी आवश्यकतानुसार धन निकाल सकते हैं, अलख सुबह से लम्बी पक्तियों में खड़े सैकड़ों लोगों को पुलिस बल की सहायता से खदेड़ा जा रहा है .

आज दिनांक १३ अप्रैल २०२० को पंजाब नेशनल बैंक की ऊंचागाँव (जनपद बुलंदशहर) स्थित शाखा के समक्ष लोग सुबह ८ बजे से ही लाइन लगाने लगे थे, जब कि बैंक सेवायें १० बजे आरम्भ होती हैं . १० से 11 बजे तक लोगों ने बड़े ही अनुशासित ढंग से बैंक शाखा से धन प्राप्त करते रहे. 11 बजे पुरुषों की लाइन में लगभग 50 और महिलाओं की लाइन में लगभग २०० महिलायें उपस्थित थे, जिनको वहां से पुलिस द्वारा खदेड़ दिया गया . ऐसा कोई कारण नहीं था कि बैंक सेवाओं को सामान्यतः निर्धारित समय तक जारी ना रखा जा सके और लोगों को गुजर-बसर के लिए उनके खातों से उन्हें धन निकाल लेने दिया जाए .

यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि सरकार ने कुछ महिला खातों में गुजर-बसर के लिए 500 रुपये प्रति महिला भेजे हैं, साथ ही बैंकों के माध्यम से सुनिश्चित किया है कि यह धन निर्धन महिलाओं तक ना पहुंचे . सरकार एवं बैंक की यह तानाशाही निर्धनता के प्रति अति अमानवीय उपहास है जिसके लिए इनके विरुद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए .

राम बन्सल

खंदोई, जनपद बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश

मोबाइल ९१४९३०२३२२

आधार नंबर २४५३ ६८९८ ४९२२

TRUST

INDIAN NATIONAL CONGRESS

for POLITICAL POWER of India


Mr Narendra Modi, Resign Immediately to save the Nation

Consensus on social media is that the government has grossly erred in dealing with the Corona virus without due consideration to problems of migrant workforce of the nation – the spine of the economy. This vital component of Indian society has been treated without dignity and forced to travel on foot hundreds of kilometers from the places of work to their respective homes – the worst ever exodus of humanity in Indian history. This exodus nullified 21 day lockdown imposed by the government without making any due preparations. None but those in the government are accountable for this folly.

Downfall of India economy and devaluation of Indian Rupee in the last 6 years has created an alarming situation wherein only economic offenders in close company of those in power have been flourishing, leaving 90 percent of Indian population in lurch. The beginning of downfall was planned through lucrative names of Jan dhan yojna, Demonetization, Banking frauds under nose of the authorities, and sale of public sector undertakings at throw away prices to those close to powerful persons. In the process, the government misspent on statues, news media publicity and foreign trips of the Prime Minister to the extent that even the reserve funds of RBI, SEBI, etc leaving nothing to deal with national emergencies.

The fraud with the people got intensified by Election Commission of India through manipulations in EVMs during 2019 elections. Votes by people were derecognized with artificial vote counts by the EVMs in 303 parliamentary constituencies to favor BJP. For this reason, 2019 election results are still not declared by the ECI with full authentic data, hence the government formed on the basis of faked data is illegal.

Then came another master manipulation by the Home Minister Amit Shah for de-recognition of citizenship of Indian Muslims. For defaming Muslims, the government managed attacks on JNU and Jamia Milia Islamia students and Muslim population of North East Delhi with use of Delhi Police and private armies of RSS – Hindu Mahasabha, Bajrang Dal, etc and then booking Muslims for rioting.

For all these follies, Narendra Modi being the Prime Minister is accountable. He must resign right now to save the nation from going further downhill.

क्रान्तिमय राजनीति

शासन व्यवस्था में जनता की आवाज़

- ईमानदारी सर्वदा सर्वथा -

मित्रो,

देश लगातार लूटा जा रहा है, रुपये का अप्रत्याशित अवमूल्यन हो चुका है, महंगाई और बेरोज़गारी अपने चरम पर हैं, उद्योग धंधे ठप हैं, बैंकों को कंगाल किया जा चुका है, देश की समस्त संपदा लूटे जाने के बाद सत्ताधारी देश को कर्जों में डुबो रहे हैं.

लोगों को भूखा-प्यासा मरने को मजबूर किया जा रहा है, कोरोना संकट के विरुद्ध सरकार कोई ठोस योजना के साथ कार्य नहीं कर रही है. यहाँ तक कि टेस्ट-किट, चिकित्साकर्मियों हेतु सुरक्षा सामग्री, आदि कुछ भी पर्याप्त मात्र में उपलब्ध नहीं हैं. जन-सामान्य ही नहीं चिकित्साकर्मी भी कोरोना अतिक्रमण से मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं, आइसोलेशन वार्ड डिटेंशन कैम्पों की तरह कार्य कर रहे हैं जहां सफाई, भोजन, पानी आदि की समुचित व्यवस्था नहीं है.

धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध सत्ताधारियों की निजी सेनाओं द्वारा आक्रमण किये जा रहे हैं, और उन्हें बदनाम करके बहुसंख्यकों को भड़काया जा रहा है. दलित वर्गों के साथ पुनः अछूत शूद्रों जैसा व्यवहार किया जा रहा है.

इस संकट की घडी में भी सत्ताधारी खरीदारी में अपनी निजी कमाई के अवसर खोज रहे हैं और लाभ उठा रहे हैं. कोरोना के नाम पर लिया गया दान मोदी की निजी संपदा बन गया है.

देश कर राजनैतिक वातावरण लूट-खसोट का वातावरण बना दिया गया है. जहां सामान्य-जन कठोर परिश्रम करके औसतन 10,000 रुपये कमा पाता है, वहीँ एक राजनेता - विधान सभा, संसद सदस्य आदि, अनेक अधिकारों के साथ सार्वजनिक धन से न्यूनतम 2 लाख रुपये प्रति महीने और जीवन-भर पेंशन पा रहा है, पुलिस बल केवल नेताओं की सुरक्षा कर रहा है और जनता के साथ निर्दयी व्यवहार कर रहा है, न्यायालय सत्ताधारियों के गुलाम बन गए हैं. अधिकतर जन संचार माध्यम सत्ताधारियों के मित्र अम्बानी और अडानी के स्वामित्व में होने के कारण और सरकार से विज्ञापनों के बहाने अपार धन पाते रहने के कारण सत्ताधारियों के प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं.

सत्ता के दुरूपयोग, लोकतंत्र के विनाश एवं जनता के दमन का विरोध करने वालों को कारागारों में डाला जा रहा है, जहां उन्हें न्याय पाने की कोई आशा नहीं रह जाती. इस पर भी कुछ लोग अद्वितीय साहस के साथ संघर्ष कर रहे हैं.

अब देश बचाने के लिए प्रत्येक बुद्धिवादी नागरिक को उठ खडा होना होगा, देश और देश की राजनैतिक सत्ता को लुटेरों के लिए नहीं छोड़ा जा सकता. इनसे राजनैतिक सत्ता को वापिस जनता के सच्चे हितैषियों के हाथ में देना होगा. देश में एक आदर्श राजनीति का आरम्भ करना होगा, जिसके अंतर्गत ऐसे नागरिकों से आग्रह है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों से आदर्श प्रत्याशियों के रूप में चुनाव लड़ें. पराजय से भयभीत हुए बिना राजनैतिक आदर्शों पर अटल रहें. प्रस्ताव-स्वरूप इस आदर्श राजनीति के कुछ आरंभिक बिंदु निम्नांकित हैं -

  • प्रत्याशी चुनाव प्रचार में अत्यावश्यक न्यूनतम धन व्यय करेगा, लक्ष्य येन केन प्रकारेण चुनाव जीतना न रखकर देश में आदर्श राजनीति की स्थापना होना चाहिए.
  • प्रत्याशी चुनाव जीतने पर सार्वजनिक धन से केवल 15,000 रूपए प्रतिमाह स्वीकार करेगा, एवं कोई पेंशन नहीं लेगा.
  • विधान सभा/संसद की सदस्यता के समय वह सतत संघर्ष करता रहेगा कि सभी सदस्यों के वेतन भत्ते आदि की अधिकतम सीमा 15,000 कर दी जाए, जो प्रदेश/देश की प्रति परिवार औसत आय से सम्बद्ध हो. . .

तदनुसार, मैं रुड़की विश्वविद्यायाय से इंजिनियरिंग स्नातक राम बन्सल,अपने विधान सभा क्षेत्र सियाना जनपद बुलंदशहर उत्तर प्रदेश से अगले विधान सभा चुनाव में प्रत्याशी होने का प्रस्ताव करता हूँ. इसके लिए अभी से जन-जागृति आरम्भ करूंगा. यदि कोई अन्य समधर्मी प्रत्याशी बना चाहे तो मैं अपना प्रस्ताव वापस लेकर उसका समर्थन करूंगा.

इस प्रकार के एक या दो प्रत्याशी मैदान में होने पर्याप्त नहीं होगा, एक जन आन्दोलन का रूप देने के लिए लगभग 100 कर्मठ लोग मैदान में आयें.

इस राजनैतिक आदर्श की स्थापना के विषय में सुझाव आमंत्रित हैं,

Revolutionary Politics

People's voice in Governance

- Honesty, All Ways, Always -

Friends,

The Nation is being continuously cheated economically, Rupee has fallen down, inflation and unemployment are on peak, Banks have been made paupers, and those in power after looting the nation are busy drowning it in debts.

People are forced to die of hunger and thirst, and the central government has no solid working plan to combat Corona. Even test-kits and protective gears for medical professionals are not adequate, for which not only common people but medical professionals too are dying for Corona infection.

Minorities are being attacked by private armies of ruling clan, and people are being instigated against them after defaming them. Working class people are again being treated like untouchable Shoodra.

Even in the present crisis, ruling clan is looking for personal profiteering and taking advantage of. Donations collected in the name of Corona has become personal asset of Modi.

Political environment of the nation has been turned to that of economic offences, wherein those involved in hard work hardly earn Rs 10,000 a month on an average, politicians like MLAs/MPs are getting a minimum of Rs 2,00,000 per month with too many previleges and pensions for the whole life. Police force has been reduced to protectors of politicians and tormenters of people, courts have become subordinate to those in power. Most of the News Media is owned by Ambani and Adani are getting huge amounts from public money in name of government advertisements, hence broadcast programs for benefits of ruling clan.

Those opposing misuse of political power, destruction of Democracy, and oppression of people are being put behing bars where they can expect no justice. Inspite of this, there are some people who are struggling boldly.

Now, for saving the Nation, every intellectual would have to rise up to snatch political power from hands of culprits and put back in hands of those who bother for interests of people of the Nation. A new beginning has to be made for ushering a new ideal political climate in the Nation under which ideal persons contest elections without bothering for defeat or victory but being strict on political ideals. As proposals, some key points of the ideal politics are given hare under -

  • The candidate would spend only a bare minimum amount of money on electioneering with the objective of establishing ideal politics instead of just winning the elections.
  • On winning the election, the person would take a maximum of Rs 15,000 per month and wouldn't accept any pension,
  • During their membership of State Assembly /Parliament, the person would go on struggling for reducing emoluments of MLA/MP to a maximum of Rs 15,000 and connected to average family income of the state/nation.

Accordingly, I Ram Bansal an Engineering Graduate from University of Roorkee hereby propose my candidature from Assembly contituency Siyana, District Bulandshahr, U.P. for the next State Assembly elections in the State. I would begin awakening people right from now. If there comes up some other candidate of same ideals, I would withdraw my proposal and support them.

Being one or two such candidates in the field won't be enough, it must become a public movement with about 100 candidates to begin with.

Your valued suggestions are welcome on this issue.

जनसाधारण बनाम विधायिका सदस्य आय

भारतीय राजनीति को कांग्रेस का दिया हुआ रोग है - विधायिका सदस्यों के वेतन-भत्ते बढाते-बढाते इतना अधिक - लगभग 3 लाख रुपये प्रति माह, कर देना कि वे स्वयं को अतिश्रेष्ठ नागरिक समझते हुए जनसाधारण को तुच्छ समझने लगे. यही भावना जनता के राजनैतिक शोषण का मूल है. इसी के कारण वर्तमान सरकार ने तो जनसाधारण को नागरिक स्वीकार करने की भी अपनी शर्तें लगा दीं.

वर्तमान सरकार ने जनसाधारण के गुजारे हेतु 500 रुपये प्रति माह पर्याप्त मानकर कोरोना संकट में यह राशि कुछ लोगों को भिजवाई है, यही सरकार विधायिका सदस्यों को 3 लाख रुपये प्रति माह दे रही है. आज जनसाधारण की कठोर परिश्रम करने पर भी औसत आय लगभग 5,000 रुपये मासिक है, विधायिका सदस्यों के वेतन-भत्तों का आधार यही औसत आय होना चाहिए, जो वर्तमान परिस्थितियों में 15,000 रुपये मासिक से अधिक नहीं होना चाहिए.

यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि जनता विधायिका सदस्य चुनती है, जिन्हें जनता चुनने का कोई अधिकार नहीं है, अतः, जनसाधारण विधायिका सदस्यों की तुलना में श्रेष्ठतर नागरिक हैं.

देश के राजनैतिक शोधन हेतु हमें जनसाधारण और विधायिका सदस्यों की आय में विकराल अन्ताराल को समाप्त करना होगा. जिसके लिए एक स्वर मेरा होगा जो मैं उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव में अपने क्षेत्र सियाना से एक आदर्श प्रत्याशी बनकर लोगों तक पहुंचाना प्रस्तावित करता हूँ. चुनाव में विजयी होने पर मैं केवल 15,000 रुपये ही अपने वेतन-भत्ते के रूप स्वीकार करूंगा एवं इसे वैधानिक मान्यता प्रदान करने के प्रयास करता रहूँगा .

भारतवासियों के नाम एक पत्र

प्रिय बन्धुओ,

कोरोना वायरस की उत्पत्ति हमारे वश में नहीं थी किन्तु देश के लोगों में उसका प्रसार बेशक भारत में सरकार के एक मात्र कार्यवाह के नियंत्रण में था जिसके लिए उसके पास पर्याप्त समय था, एवं उसने नियंत्रण के नाम पर अत्यधिक धन एवं अन्य संसाधनों को अपने नियंत्रण में ले लिया था. किन्तु कोरोना प्रसार को रोकने का न तो कोई प्रयास स्वयं किया और ना ही अपने लगभग 50 मंत्रियों में से किसी अन्य मंत्री को ऐसा करने दिया, जब कि इन मंत्रियों द्वारा कुछ भी ना किये जाने पर भी उनके खातों में उनके वेतन-भत्ते भेजे जाते रहे.

इस अतिविशिष्ट व्यक्ति द्वारा अपने कर्त्तव्य के विपरीत कोरोना प्रसार के पर्याप्त उपाय किये गए - विश्व के संक्रमित देशों से 15,00,000 भारतीयों को निःशुल्क वायुयानों से लाकर भारत में मुक्त छोड़ देना, एवं भारत की लगभग 4,00,00,000 उत्पादक श्रमशक्ति के जीवनयापन की व्यवस्था किये बिना एक तानाशाह की तरह अचानक सर्वस्व तालाबंदी घोषित कर समस्त श्रमशक्ति को भूख और प्यास से उत्पन्न मौत के मुंह में धकेल देना.

सरकार की उक्त लापरवाहियों के कारण देश में विकराल परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गयीं हैं जिनमें कोई भी भारतीय सुरक्षित नहीं रह गया है - एक ओर कोरोना वायरस अपने विषमय हाथ पसारे खडा है जो देश की समस्त जनसँख्या को निगलने में सक्षम कर दिया गया है, दूसरी ओर, भारत की समस्त श्रमशक्ति के सदस्य अपने अपने घर पहुँचने की चाह में सैकड़ों मील पैदल चलते हुए भूखे-प्यासे मौत के ग्रास बन रहे हैं जिसके लिए सरकार पूरी तरह अपनी संवेदना खो चुकी है.

दो माह का बहुमूल्य समय बर्बाद करने के बाद सरकार ने जो विशेष रेलगाड़ियाँ श्रमिकों को घर पहुंचाने के नाम पर चलाईं हैं, वे हिटलर के गैस चेम्बरों से कम भयावह नहीं हैं - उनके गंतव्य स्थानों पर कोई नियंत्रण नहीं है जिससे घर पहुँचाने के उत्सुक यात्री खुद को कहीं और पा रहे हैं. यात्रा में सामान्यतः एक दिन का समय लेने वाली रेलें चार दिन में यात्रा पूरी कर रही है जिस दौरान उनमें पानी की एक बूँद की भी व्यवस्था नहीं है, भोजन आदि की तो कोई संभावना है ही नहीं. लोग ऐसे नारकीय जीवन से परेशां होकर अपनी जानें दे रहे हैं, कुछ भूखे-प्यासे मर रहे हैं. जो शेष बचते हैं वे अति रुग्ण अवस्था में पहुँच रहे हैं.

ऐसी विकराल स्थिति में बहुत भारी मन से आपसे यह आग्रह कर रहा हूँ कि जो अभी भी चिंतन करने में सक्षम हैं, वे देश और समाज के बारे में कुछ चिंतन करें, अन्यथा हम देश और समाज दोनों को पथ-भृष्ट पायेंगे. तथापि मुझे यह भी एहसास है कि भूख और प्यास ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिंतन है.

अज़र

मई २७, २०२०

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